चंपारण के ऐतिहासिक भीतरहवा आश्रम में ‘जहां पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ’ यात्रा का समापन

प्रेस विज्ञप्ति – 22 अप्रैल 2026
भीतरहवा आश्रम , पश्चिमी चंपारण

जहां पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ
पटना से चंपारण यात्रा
10 अप्रैल से 22 अप्रैल 2026

“सर्वोदय आंदोलन को पुनः सक्रिय करने और गांधी से जुड़े सही इतिहास को लोगों तक पहुँचाने के उद्देश्य में यह यात्रा सफल रही” – चन्दन पाल

“बिहार में गांधी से जुड़े ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण प्रशासनिक सहयोग और नागरिक पहल से ही संभव है” – अशोक भारत

गांधी को समझने की आम लोगों में उत्सुकता है, अब चुनौती इस संवाद को आगे बढ़ाने की है” – प्रदीप प्रियदर्शी

“आजादी के आंदोलन की विरासत, सद्भावना, लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की रक्षा और उन्हें मजबूत करने के उद्देश्य से ‘जहां पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ’ पटना से चंपारण तक यात्रा 10 अप्रैल से 22 अप्रैल तक निकाली गई। आज चंपारण में इस यात्रा का समापन हो गया।”

सुबह 8 बजे सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, रामपुरवा (गौनाहा) में स्कूल असेंबली के दौरान यात्री दल का स्कूल प्रशासन द्वारा स्वागत किया गया। इस दौरान स्कूल के बच्चों ने ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ गीत प्रस्तुत किया। यात्रा दल की ओर से उमेश तूरी ने ‘जय जगत’ गीत गाया। इसके बाद यात्रा के संयोजक अशोक भारत ने यात्री दल के सदस्यों का परिचय कराया।

बच्चों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के विचारों के अनुसार अहिंसा का वास्तविक अर्थ प्रेम है, जो हर व्यक्ति और सभी जीवों के प्रति समान भाव रखने की प्रेरणा देता है। यही बापू का प्रमुख संदेश था, जिसे समाज तक पहुँचाने का प्रयास किया गया। गांधी का  मानना था कि दुनिया नफरत के रास्ते पर नहीं, बल्कि प्रेम और सद्भावना से ही आगे बढ़ सकती है।महात्मा गांधी ने दिखाया कि अन्याय का अहिंसक प्रतिकार संभव है, जिसका प्रयोग दक्षिण अफ्रीका और चंपारण में सफल रहा। उनके विचारों का आधार सत्य और अहिंसा था, जिसमें सभी के प्रति प्रेम और करुणा शामिल है। स्वराज के लिए उन्होंने 18 रचनात्मक कार्यक्रम शुरू किए, जिनमें सर्वधर्म सद्भभाव सबसे महत्वपूर्ण था, जो आज भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान में झलकता है। भारत की धार्मिक विविधता उनके विचारों को मजबूत करती है। चंपारण आंदोलन ने लोगों में निर्भयता पैदा की और स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। प्रेम, शांति, सद्भावना और सेवा ही आजादी की असली विरासत हैं। उनका ‘स्वराज’ ऐसा समाज है जहाँ अंतिम व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीवन मिले, और उन्होंने स्पष्ट किया कि दुनिया प्रेम, अहिंसा और संवाद से ही चल सकती है। 

इसके पश्चात यात्रा दल ने अपने अंतिम पड़ाव, ऐतिहासिक भीतरहवा आश्रम की ओर प्रस्थान किया। इसी क्रम में यात्रा दल ने भीतरहवा आश्रम के समीप स्थित श्रीरामपुर गांव, गौनाहा (पश्चिम चंपारण) में पदयात्रा भी की। श्रीरामपुर गांव का विशेष ऐतिहासिक महत्व है। महात्मा गांधी चंपारण सत्याग्रह के दौरान इस क्षेत्र में आए थे और यहां ठहरकर स्थानीय किसानों एवं ग्रामीणों की समस्याओं को करीब से समझा था। 
गांव में कस्तूरबा गांधी ने भी महिलाओं के बीच महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने स्वच्छता, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण महिलाओं को संगठित किया, जो उस समय के लिए एक क्रांतिकारी पहल थी। 

इसके बाद यात्रा दल कस्तूरबा कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय पहुँचा। यहाँ छात्राओं द्वारा आम के पत्तों से बनाए गए मुकुट से यात्री दल का स्वागत किया गया। स्कूल प्रशासन को ‘गांधी दर्शन के तात्विक आधार’ पुस्तक, सर्वोदय डायरी और कस्तूरबा कैलेंडर स्मृति-स्वरूप भेंट किए गए।

यात्रा अपने अंतिम पड़ाव ऐतिहासिक भीतरहवा आश्रम पहुंची। भितिहरवा आश्रम एक  ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ से महात्मा गांधी ने भारत में सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की थी। भीतरहवा आश्रम की स्थापना स्वयं गांधी जी ने 16 नवंबर, 1917 को की थी। यह न केवल एक राजनीतिक केंद्र था, बल्कि गांधी जी ने इसे सामाजिक सुधार, शिक्षा और स्वच्छता के प्रसार के लिए एक आधार के रूप में इस्तेमाल किया था। यात्री दल द्वारा आश्रम में सर्व धर्म प्रार्थना किया गया। 

यात्री दल ने यहाँ संग्रहालय का भ्रमण किया। संग्रहालय में गांधी के जहाँ-जहाँ कदम पड़े, उससे जुड़े फोटोज, बापू द्वारा इस्तेमाल की गई घंटी, मेज तथा कस्तूरबा गांधी द्वारा उपयोग किया जाने वाला ‘जांता’ (पत्थर की चक्की) आदि भी संग्रहित हैं।

इसके बाद यात्रा का अंतिम समापन सत्र कस्तूरबा कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय के परिसर में आयोजित हुआ । यात्रा संयोजक अशोक भारत ने सत्र का संचालन किया। उन्होंने यात्रा अनुभवों को साझा करते हुए कहा किइस यात्रा का मुख्य उद्देश्य महात्मा गांधी के सहयोगियों और आजादी के गुमनाम नायकों को नई पीढ़ी से परिचित कराना था। पटना, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी और वीर औयारा जैसे स्थानों पर अलग-अलग विषयों-चंपारण सत्याग्रह के संदेश, लोकतंत्र, संविधान और भूमि संबंधी मुद्दों पर संवाद आयोजित किए गए। यात्रा में महिलाओं, किशोरियों और छात्रों सहित व्यापक जनभागीदारी देखने को मिली, जिससे समाज में सकारात्मक जागरूकता बढ़ी।


यात्रा के दौरान देखा गया कि कई ऐतिहासिक स्थलों को धरोहर घोषित किए जाने के बावजूद उनकी देखभाल में सरकारी उदासीनता बनी हुई है, जैसे मुजफ्फरपुर में गया बाबू द्वारा दी गई जमीन पर अब तक कार्य नहीं हुआ, जबकि फंड का आवंटन हो चुका है। साथ ही, गांधी जी द्वारा स्थापित बुनियादी विद्यालयों की मूल पहचान धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। गांधी से जुड़े सभी ऐतिहासिक स्थलों का समुचित संरक्षण और विकास नागरिक व प्रशासनिक सहयोग से सुनिश्चित किया जाए, साथ ही भूमिहीनता जैसे सामाजिक मुद्दों पर ठोस और सामूहिक पहल की जाए।

यात्रा संयोजक प्रदीप प्रियदर्शी ने बताया कि महात्मा गांधी को सुनने और समझने के लिए लोगों में गहरी उत्सुकता है, लेकिन चुनौती यह है कि इस संवाद की प्रक्रिया को आगे कैसे बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि परचाधारियों के साथ अच्छा संवाद हुआ और युवाओं को गांधी से जोड़ने की दिशा में भी सार्थक चर्चा हुई। हर जगह इस यात्रा को स्नेह और सहयोग मिला, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि यह यात्रा केवल सहयोग प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि लोगों को इससे आत्मिक रूप से जोड़ने का प्रयास है, और इसके अगले चरण में इन बातों को और विस्तार से रखा जाएगा। 

सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चन्दन पाल ने कहा कि यह यात्रा सर्वोदय आंदोलन को फिर से सक्रिय करने और उससे जुड़े संगठनों व कार्यकर्ताओं को जनता के बीच वापस लाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के आंदोलन के सही इतिहास को सामने लाना जरूरी है, ताकि फैलाए जा रहे गलत नैरेटिव का मुकाबला किया जा सके और नई पीढ़ी को सही दृष्टिकोण मिल सके, जिसमें जयप्रकाश नारायण के विचार भी शामिल हों। उन्होंने यह भी कहा कि इस यात्रा के माध्यम से बिहार की सांस्कृतिक विरासत को नई दिशा देने का प्रयास किया गया । विभिन्न राज्यों में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने भी प्रयास है । अंत में उन्होंने उत्तर प्रदेश के चंदौली में चल रहे कार्यकर्ताओं के संघर्ष, उड़ीसा में वेदांत के खिलाफ आंदोलन, नोएडा के श्रमिक आंदोलन तथा बेतिया और अन्य क्षेत्रों में साथियों द्वारा किए जा रहे प्रयासों के प्रति एकजुटता प्रकट की।

सर्व सेवा संघ के मंत्री अरविंद अंजुम ने कहा कि यह यात्रा सुव्यवस्थित और आत्मीयता से सराबोर रही। यह एक सामूहिक प्रयास था, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से लोग जुड़कर योगदान दे रहे थे। उन्होंने याद दिलाया कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने चंपारण सत्याग्रह के संदर्भ में इस बात पर अफसोस जताया था कि महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए रचनात्मक कार्य निरंतर जारी नहीं रह सके। उन्होंने कहा कि गांधी जी, कस्तूरबा गांधी और अन्य स्वयंसेवकों ने लगभग दो वर्षों तक काम किया, लेकिन उनके जाने के बाद वह कार्य जारी नहीं रह सका, जो बिहार के लिए एक बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बिहार के नवनिर्माण के लिए केवल संघर्ष ही नहीं, बल्कि रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरी गंभीरता से आगे बढ़ाना जरूरी है, और इस यात्रा का उद्देश्य भी यही है कि सभी मिलकर उस कमी को दूर करें जो अब तक बनी हुई है।

महाराष्ट्र के ब्रह्म विद्या मंदिर पवनार से ज्योति बहन ने कहा कि महात्मा गांधी का मानना था कि आजादी के बाद जमीनों का न्यायपूर्ण बँटवारा अनिवार्य है, अन्यथा वे लूट ली जाएँगी, और इसी सोच को आगे बढ़ाने का प्रयास भूदान आंदोलन के माध्यम से किया गया। उन्होंने बताया कि विनोबा भावे ने भूदान को एक निरंतर चलने वाली ‘आरोहण’ की प्रक्रिया माना, जिसमें जमीन मिलने के साथ ही उसका त्वरित वितरण जरूरी है। जमीन के साथ साथ खेती के लिए साधन भी जरूरी है ताकि एक न्यायपूर्ण, अहिंसक समाज का निर्माण हो सके।

उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज ने कहा कि मोतिहारी और चंपारण के अनुभव बताते हैं कि कई पीढ़ियों बाद भी लोग गांधीजी को याद करते हैं और उनके विचारों से जुड़ना चाहते हैं। साथ ही, उन्होंने बिहार में भूमि समस्या को एक गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि इसके समाधान के लिए अगले दो वर्षों तक लगातार काम करने का संकल्प लिया जाए । उन्होंने यह भी कहा कि इस दिशा में भूमि सुधार से जुड़े विशेषज्ञों के साथ बैठक कर एक ठोस कार्यक्रम तैयार किया जाएगा, ताकि इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके और यही गांधीजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

एकता परिषद से ग्यांती देवी ने कहा कि सीलिंग से फाजिल जमीन का पर्चा बगहा के भूमिहीन आदिवासी एवं दलितों को दिया गया है, लेकिन आज तक उस पर कब्जा कानूनी रूप से स्थापित नहीं हो पाया है। गैर मजरूआ आम मालिक की इस जमीन पर वन विभाग अपना दावा कर रहा है, जबकि उसके पास इसे वन भूमि साबित करने से संबंधित कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। वन विभाग के लोगों ने कई घरों को नष्ट कर दिया है, जिससे लोग इस भीषण गर्मी में बाहर रहने को मजबूर हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर लोग ही नहीं बचेंगे, तो जमीन का क्या करेंगे?”

इस अवसर पर शत्रुघ्न झा, रामनारायण मिश्रा और पंकज श्रीवास्तव ने भी अपने विचार रखे। अंत में सईद सिद्दीकी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

समापन सत्र के अंत में पटना से चंपारण तक की यात्रा में शामिल यात्रियों को ‘गांधी जरूरी है’ पुस्तक, सर्वोदय डायरी और कस्तूरबा कैलेंडर स्मृति-स्वरूप भेंट किए गए।

आज यात्रा दल में शामिल सदस्य:

सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल, यात्रा संयोजक अशोक भारत एवं प्रदीप प्रियदर्शी, सर्व सेवा संघ के सचिव अरविंद अंजुम, उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज, सामाजिक कार्यकर्ता सिस्टर फ्लोरिन , हिमालय विजेता कीर्ति, वैज्ञानिक चेतना निर्माण कार्यकर्ता विकास कुमार, युवा कार्यकर्ता, उमेश तूरी, मयूर साखरे, पर्यावरण कार्यकर्ता अनूप कुमार, अशोक कुमार सिंह, विष्णु कुमार , पंजाब से सुनील कुमार शर्मा , सिराज अहमद ( जौनपुर)  , ब्रह्म विद्या मंदिर, विनोबा आश्रम, पवनार ज्योति बहन, गुजरात से जम्मू बहन, बंगाल से जीतेन नंदी, कस्तूरबा ट्रस्ट से संबंधित चंद्रमा, महाराष्ट्र से प्राची बहन, बेतिया से भावेश, ईश्वर चंद्र ( गाजीपुर) , एकता परिषद् के प्रदेश संयोजक के लखींद्र प्रसाद एवं मंजू बहन, शीला श्रीवास्तव, जयकरण कुशवाहा, नवज्योति , शत्रुघ्न झा, रामनारायण मिश्रा, पंकज श्रीवास्तव , सईद सिद्धिकी आदि ।