प्रेम, शांति और सामाजिक सद्भाव का संदेश लेकर मेमारी, पूर्व वर्धमान पहुंची ‘जहाँ पड़े कदम गांधी के, एक कदम गांधी के साथ’ पदयात्रा
“लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए पूरे समाज को साथ आना होगा” – सतीश मराठा
“शांति तभी संभव है, जब उसके साथ न्याय और प्रेम भी हो” – सिस्टर फ्लोरिन
“जाति-धर्म से ऊपर इंसानियत को रखना ही गांधी और रवीन्द्रनाथ की विरासत को आगे बढ़ाना है” – मनीषा बनर्जी
मेमारी, 8 अक्टूबर। गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर से शुरू हुई ‘जहाँ पड़े कदम गांधी के, एक कदम गांधी के साथ’ पदयात्रा आज अपने सातवें दिन मेमारी, पूर्व बर्दवान पहुंची। सर्व सेवा संघ एवं अन्य लोकतांत्रिक संगठनों के संयुक्त प्रयास से आयोजित यह पदयात्रा प्रेम, शांति, अहिंसा और सामाजिक सद्भाव का संदेश लेकर आगे बढ़ रही है। 16 अक्टूबर को यात्रा शांतिनिकेतन में संपन्न होगी।
देश के विभिन्न हिस्सों से आए करीब 15 राज्यों के पदयात्री इस यात्रा में शामिल हैं। सातवें दिन की शुरुआत सुबह सर्वधर्म प्रार्थना के साथ हुई। सुबह 7 बजे पदयात्रियों ने नारों और गीतों के साथ मेमारी की ओर प्रस्थान किया।
स्थानीय लोगों का मिल रहा आत्मीय सहयोग
यात्रा के दौरान एक पड़ाव पर विश्राम के लिए रुके पदयात्रियों को देखकर एक स्थानीय व्यक्ति यात्रा के उद्देश्य से प्रभावित हुआ और उसने पूरे यात्रा दल के लिए पीने के पानी की व्यवस्था की। इस तरह रास्ते में स्थानीय लोगों का सहयोग और सहभागिता यात्रा के संदेश को लगातार मजबूती दे रहा है।


सुबह करीब 10 बजे पदयात्रा नदीपुर मोड़, मेमारी, पूर्व बर्दवान पहुंची, जहां स्थानीय समाजसेवी बशीर ने यात्रा दल का स्वागत किया।
यात्रा का स्वागत करते हुए बशीर ने कहा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों से आए लोग गांधीजी के अहिंसा और शांति के मार्ग पर चल रहे हैं। आज के दौर में धर्म और जाति से ऊपर उठकर भारतीय पहचान, बंधुत्व और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह पदयात्रा किसी अशांति का संदेश नहीं, बल्कि शांति और मानवता का संदेश लेकर आगे बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि मेमारी से बर्दवान होते हुए शांतिनिकेतन तक की इस यात्रा में रवीन्द्रनाथ टैगोर के मानवतावादी विचारों को भी साथ लेकर चलने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे यात्रा के साथ कुछ कदम चलें और शांति का संदेश आगे बढ़ाएं।
मेमारी में शाम को नुक्कड़ सभा का आयोजन
दोपहर 12 बजे पदयात्रा आज के पड़ाव मेमारी स्थित महाराज बी.ए. बाड़ी पहुंची। यहां पदयात्रियों के लिए दोपहर के भोजन और विश्राम की व्यवस्था की गई।
शाम को जी.टी. रोड, मेमारी चौक में नुक्कड़ सभा आयोजित की गई। सभा स्थल पर गांधी विचारों और साहित्य के प्रसार के लिए पुस्तक स्टॉल भी लगाया गया।
सभा को संबोधित करते हुए हरियाणा से आए गांधीवादी सतीश मराठा ने कहा कि यदि देश के संविधान, लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और नागरिक अधिकारों पर संकट नहीं होता, तो गांधीजन 15 दिनों में 225 किलोमीटर की पदयात्रा करन की जरुरत नहीं पड़ती।




उन्होंने कहा कि केवल कुछ गांधीवादी मिलकर लोकतंत्र और संविधान की रक्षा नहीं कर सकते, बल्कि इसके लिए पूरे समाज को साथ आना होगा। महात्मा गांधी, बुद्ध, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद और डॉ. आंबेडकर के प्रेम, अहिंसा, सत्य और बंधुत्व के संदेश को अपनाकर देश को जोड़ने की जरूरत है।
बनारस से आए विद्याधर मास्टर ने चंद्रशेखर आजाद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संघर्ष को याद करते हुए कहा कि देश की आजादी लोगों के त्याग और साहस से हासिल हुई। उन्होंने कहा कि सुभाष बाबू ने आईसीएस जैसी प्रतिष्ठित नौकरी छोड़कर देश की आजादी के संघर्ष का रास्ता चुना। गांधीजी के साथ उनके वैचारिक मतभेद जरूर थे, लेकिन दोनों के बीच गहरा सम्मान और स्नेह था।
उन्होंने कहा कि गांधीजी के रास्ते पर चलते हुए हमारा संघर्ष अहिंसक होगा। “हम किसी पर कंकड़ नहीं मारेंगे, लेकिन संविधान की रक्षा के लिए पीछे भी नहीं हटेंगे।” उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए युवाओं और वरिष्ठ नागरिकों से आगे आने की अपील की।





बनारस से पदयात्रा में शामिल सिस्टर फ्लोरिन, जो मूल रूप से तमिलनाडु की रहने वाली हैं, ने कहा कि शांति केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति और जीव-जंतुओं के लिए भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि धर्म, देश, राज्य और भाषा के नाम पर हुए विभाजनों ने समाज को कमजोर किया है। शांति तभी संभव है, जब उसके साथ न्याय और प्रेम हो। गांधीजी के विचारों के अनुसार बदलाव की शुरुआत परिवार, पड़ोसी और गांव से होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि शांति केवल बोलने की बात नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, सोच और जीवन में दिखाई देनी चाहिए। किसी भी विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना ही न्याय और शांति की असली कसौटी है। जाति और धर्म से ऊपर उठकर इंसानियत तथा मानवीय मूल्यों के आधार पर समाज में शांति कायम करना सभी की जिम्मेदारी है।
गांधी और रवीन्द्रनाथ की समावेशी विरासत को याद किया
शांतिनिकेतन से पदयात्रा में शामिल मनीषा बनर्जी ने कहा कि गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगिनी निवेदिता, मातंगिनी हाजरा, नजरुल इस्लाम, रुकैया सखावत हुसैन, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख जैसे लोगों ने मिलकर भारत की समावेशी विरासत को गढ़ा है।
उन्होंने बर्धमान ज़िले के रासबिहारी बोस और बटुकेश्वर दत्त जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हुए कहा कि हमें अपने इतिहास और विरासत को नहीं भूलना चाहिए। जाति, धर्म, वर्ण या लिंग के आधार पर भेदभाव के बजाय मनुष्य को सबसे ऊपर रखना जरूरी है।
लालन फकीर के संदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इंसान की पहचान किसी जाति या धार्मिक चिह्न से नहीं, बल्कि उसकी मानवता से होती है। प्रेम, सद्भाव और हिंदू-मुस्लिम एकता की इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पदयात्रा शांतिनिकेतन की ओर बढ़ रही है।
सभा का संचालन सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल ने किया। कलकत्ता से आए बिप्लब नायक और सर्व सेवा संघ के मंत्री अरविंद अंजुम ने भी पदयात्रा के उद्देश्य और उसके संदेश को साझा किया। देबाशीष बेरा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
सभा के बाद मध्य प्रदेश के शहडोल से पदयात्रा में शामिल इस्तियाक ने “मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर ने बाँट लिया भगवान को,धरती बाँटी, सागर बाँटा, मत बाँटो इंसान को
और “आज धीरे-धीरे मौसम बदलने लगा है” जैसे गीत प्रस्तुत किए।
सभा के अंत में जयप्रकाश नारायण की स्मृति दिवस के अवसर पर याद किया गया एवं श्रद्धांजलि प्रार्थना दी गई।

रात में बिहार से पदयात्रा में शामिल कीर्ति का जन्मदिन केक काटकर मनाया गया ।
आज की यात्रा में निधि, अलीभा, सिस्टर फ्लोरिन, अनोखेलाल, विद्याधर मास्टर, चितरंजन प्रमाणिक, सदानंद मंडल, पारमिता , प्रदीप सरदार, देबाशीष, बिस्वजीत गोराई, विष्णु, अनूप कुमार, आसमा आदिवासी, किरण, सिद्धार्थ, चंदन पाल, बिरेन डेका, सतीश मराठा, जितेन नंदी, सोहन चक्रवर्ती, सुसोवन पाल, श्रीनिवासन, विक्रम पाटिल, उमेश टुरी, बिप्लब नायक, अरविंद अंजुम, इस्तियाक, सुशांत मोहंती, किरण वीर, सतरंजन पाल, शांतू सरदार, जगदीश कुमार और विकास कुमार सहित अन्य पदयात्री शामिल रहे।

