सोदपुर खादी प्रतिष्ठान और बैरकपुर गांधी स्मारक संग्रहालय में हुआ स्वागत
“खादी केवल वस्त्र नहीं, आत्मनिर्भरता और श्रम की गरिमा का प्रतीक है; आज खादी उद्योग और कारीगरों की स्थिति पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। – चंदन पाल
“गांधी को समझने के लिए लोगों के बीच जाकर उनसे संवाद करना जरूरी है; युवाओं को इस संवाद की परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए।” – आसमा आदिवासी
बैरकपुर, 3 अक्टूबर। गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर से शुरू हुई ‘जहाँ पड़े कदम गांधी के, एक कदम गांधी के साथ’ पदयात्रा अपने दूसरे दिन आगे बढ़ी। प्रेम, शांति, अहिंसा और सामाजिक सद्भाव का संदेश लेकर निकली यह पदयात्रा 16 अक्टूबर को शांतिनिकेतन पहुंचेगी। दूसरे दिन देश के विभिन्न हिस्सों से आए करीब 17 राज्यों के पदयात्रियों ने इसमें हिस्सा लिया।
सोदपुर खादी प्रतिष्ठान में हुआ स्वागत
दूसरे दिन पदयात्रा का प्रमुख पड़ाव पानीहाटी स्थित ऐतिहासिक सोदपुर खादी प्रतिष्ठान रहा। इस अवसर पर स्थानीय वक्ताओं ने स्थल के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सतीश चंद्र दासगुप्त आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय के प्रिय शिष्य थे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने स्वदेशी ‘फायर किंग’ अग्निशमन यंत्र बनाया, जिसे सरकार ने खरीदा। इससे प्राप्त पुरस्कार राशि से उन्होंने 1925 में पानीहाटी में 50 बीघा भूमि पर खादी प्रतिष्ठान की स्थापना की, जिसका उद्घाटन 2 फरवरी 1925 को महात्मा गांधी ने किया था।
महात्मा गांधी इस परिसर को साबरमती के बाद अपना ‘दूसरा आश्रम’ मानते थे और 1940 के बाद बंगाल आने पर यहां ठहरते थे। वर्ष 1939 में त्रिपुरी कांग्रेस के बाद सुभाष चंद्र बोस ने इसी स्थान पर कांग्रेस अध्यक्ष पद से अपना त्यागपत्र लिखा था। वक्ताओं ने पानीहाटी की अन्य ऐतिहासिक विरासतों, जैसे बेगम रोकैया की कब्र, रवींद्रनाथ टैगोर के पेनेटी बागान आगमन और चैतन्य महाप्रभु के आगमन का भी स्मरण किया।
खादी, नोआखाली और गांधी के रचनात्मक कार्यों पर चर्चा
सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल ने कहा कि नोआखाली में जब दंगा हुआ था, तब गांधी सीधे इसी आश्रम में आए थे और यहीं से नोआखाली गए थे। उस वक्त गांधीजी के साथ मनु गांधी भी थीं। मनु गांधी गांधीजी को “Bapu Is My Mother” कहती थीं, क्योंकि गांधीजी ने मनु को पढ़ना-लिखना सिखाया। उन्होंने कहा कि 1925 में चरखा संघ बना था, जिसे अब 100 साल पूरे हो चुके हैं। उन्होंने मौजूदा खादी उद्योग पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज खादी उद्योग विकट परिस्थितियों में है, क्योंकि खादी के मजदूरों को उचित श्रम नहीं मिलता और बाजार में बिकने वाला खादी असल में खादी नहीं है।
गीतों और कविताओं में सामाजिक सरोकार
सोदपुर खादी प्रतिष्ठान में बेलघरिया सांस्कृतिक दल ने कविता और गीतों के माध्यम से बेलेघाटा खाल, ढाकुरिया, रवींद्र सरोवर, शालिमार और टिकियापाड़ा में गरीबों एवं झुग्गीवासियों के घर उजाड़े जाने के सवाल को उठाया। प्रस्तुतियों में विस्थापन और विभाजन की पीड़ा के साथ जाति, वर्ग तथा अमीरी-गरीबी की दीवारें तोड़ने और किसानों-मजदूरों की एकता का संदेश दिया गया। भूपेन हजारिका के गीत के माध्यम से मानवता, सहानुभूति और भाईचारे की भावना को सामने रखा गया।
इसके बाद खरदह से आए सुखेंदु दास ने लालन फकीर का लोकगीत प्रस्तुत किया। इस अवसर पर लालन फकीर और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच साझा बंगाली लोक-मानवतावादी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा गया कि दोनों की सांस्कृतिक विरासत में मानवता, समानता, प्रेम और भेदभाव से परे समाज की भावना महत्वपूर्ण रही है।
विमल कुमार बोस, कलकत्ता हाई कोर्ट के अधिवक्ता, सधन चट्टोपाध्याय, चंद्रशेखर, दिलीप कुमार दास (जनता समाचार, कोलकाता) और बिस्वास दास ने भी पदयात्रियों का अभिनंदन किया।
आम लोगों से संवाद बना यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा
सोदपुर खादी प्रतिष्ठान में भोजन के बाद पदयात्रा आगे बढ़ी। गीतों, नारों और पर्चों के माध्यम से यात्रा का संदेश आम लोगों तक पहुंचाया गया। रास्ते में लोगों ने पदयात्रियों के प्रति रुचि दिखाई और अपनी स्थानीय समस्याओं को भी साझा किया। आज पदयात्रियों ने प्रेम, शांति, बंधुत्व और मानवता का संदेश देने वाले प्लेकार्ड भी लगाए जिनमें गुरु नानक, रवींद्रनाथ टैगोर, गांधी आदि के विचारों का संदर्भ था।
बैरकपुर गांधी स्मारक संग्रहालय में हुआ स्वागत
शाम को पदयात्री बैरकपुर गांधी स्मारक संग्रहालय पहुंचे, जहां स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया गया। संग्रहालय के निदेशक डॉ. प्रदीप घोष ने सभी पदयात्रियों का स्वागत किया। कार्यक्रम की शुरुआत देवदास मांझी की बंगला गीत प्रस्तुति से हुई।
मध्य प्रदेश से पदयात्रा से जुड़ी आसमा आदिवासी ने कहा कि गांधी को समझने के लिए लोगों के बीच जाकर उनसे संवाद करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इसी उद्देश्य से यात्रा उन गांवों, शहरों और स्थानों तक पहुंच रही है जहां गांधी जी के कदम पड़े थे। गांधी जी ने किसानों, गरीबों, व्यवसायियों और समाज के हर वर्ग से संवाद किया था और युवाओं को भी लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझने तथा संवाद की इस परंपरा को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
बनारस से जुड़ी सिस्टर फ्लोरीन ने कहा कि गांधी जी के समानता, सत्य और अहिंसा के सिद्धांत आज भी समाज को जोड़ने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने आपसी प्रेम, संवाद, सुनने और अनुभव साझा करने को सामाजिक दीवारों को पार करने का माध्यम बताया और कहा कि साझा मानवता की भावना से अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक-दूसरे को समझने और सहानुभूति विकसित करने के लिए साथ आ सकते हैं।
नोआखाली पर निर्मल कुमार बोस की पुस्तक का पुनर्मुद्रण
कार्यक्रम में 1949 में प्रो. निर्मल कुमार बोस द्वारा लिखित नोआखाली में गांधी जी की शांति यात्रा पर आधारित ऐतिहासिक पुस्तक का पुनर्मुद्रण भी जारी किया गया। गांधी जी के साथ नोआखाली यात्रा में रहे निर्मल कुमार बोस ने गांव-गांव की घटनाओं और अपने अनुभवों को इस पुस्तक में दर्ज किया था। पुस्तक के अब आसानी से उपलब्ध न होने के कारण इसका पुनर्मुद्रण कराया गया, जिसका कार्यक्रम में औपचारिक विमोचन किया गया।
कार्यक्रम के अंत में महाराष्ट्र से आए शेख हुसैन ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
दिनभर में लगभग 20 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर पदयात्री बैरकपुर स्थित गुरुद्वारा पहुंचे, जहां रात्रि विश्राम हुआ।
पदयात्रा में शामिल प्रमुख लोगों में आइकैन के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद मूर्ति, शेख हुसैन, राजश्री, निधि, अलीभा, सिस्टर फ्लोरिना, मोहित, देबाशीष, आयशा, आसमा आदिवासी, रीपांजल लकड़ा, कुंती बोइपाई, निधि मुंडा, अजय बेसरा, किरण, पंकज श्रीवास्तव, सुख चन्द्र झा, सिद्धार्थ, शिव शंकर दास, मोहित, सोमित आचार्य, बशीर, चंदन पाल, अशोक भारत, बिरेन डेका, सतीश मराठा, बिपिन, जितेन नंदी, श्रीनिवासन, एम.एच. पाटिल, विक्रम पाटिल, उमेश टुरी, बिप्लब नायक, अरविंद अंजुम, अमृत बाउरी, सोहन, अभिजीत, सतिया, अज़हर, इस्ताक, रामाकांत, आयुष, सुशांत मोहंती, किरण वीर, आयशा खातून, जगदीश कुमार, विकास कुमार सहित अन्य पदयात्री शामिल रहे।
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