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करके सीखना’ ही शिक्षा का मूल सिद्धांत है – यत्रा का 11वां दिन

“‘करके सीखना’ ही शिक्षा का मूल सिद्धांत है, गांधी की नई तालीम आज भी प्रासंगिक है।” – अरविंद अंजुम

“भारत में बहु-स्तरीय शिक्षा व्यवस्था सामाजिक असमानता को बढ़ाती है; इसे समाप्त करना आवश्यक है।” – शाहिद कमल

प्रेस विज्ञप्ति – 20 अप्रैल 2026
नरकटियागंज, पश्चिमी चंपारण

जहां पड़े पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ
पटना से चंपारण यात्रा
10 अप्रैल से 22 अप्रैल 2026

आजादी के आंदोलन की विरासत, सद्भावना, लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की रक्षा और उन्हें मजबूत करने के उद्देश्य से “जहां पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ” पटना से चंपारण यात्रा निकाली गई है । ग्यारहवें दिन की शुरुआत पश्चिमी चंपारण के नरकटियागंज स्थित विश्व मानव सेवा आश्रम में में सर्व धर्म प्रार्थना के साथ हुई। 

सुबह 10 बजे आश्रम में यात्रियों के स्वागत में एक सभा का आयोजन किया गया जिसमें यात्री दल के अलावा बड़ी संख्या के आश्रम से जुड़ी छात्र, महिलाएं एवं स्थानीय समाजसेवी भी मौजूद रहे। 

सभा का संचालन विश्व मानव सेवा आश्रम के संस्थापक शत्रुघ्न झा ने किया । उन्होंने आश्रम के इतिहास एवं मौजूदा गतिविधियों के बारे में प्रकाश डालते हुए कहा कि आश्रम की स्थापना 12 जनवरी 1997 को हुई, जिसकी प्रेरणा स्वामी विवेकानंद की पुस्तक देववाणी से मिली, जिसमें उन्होंने गरीब, रोगी और वंचितों की सेवा को ही सच्ची ईश्वर-सेवा बताया है। शुरुआत में यह आश्रम ‘स्वामी विवेकानंद कुष्ठ आश्रम’ के रूप में शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने रेलवे स्टेशन पर रह रहे 12 कुष्ठ रोगियों को एक पुराने घर में आश्रय देकर उनकी सेवा प्रारंभ की। बाद में साबरमती आश्रम, सेवाग्राम आश्रम और विनोबा भावे के पवनार आश्रम के विचारों से प्रेरित होकर ‘विश्व मानव’ की अवधारणा विकसित हुई और आश्रम का नाम ‘विश्व मानव सेवा आश्रम’ रखा गया।

आश्रम कुष्ठ रोगियों के प्रति भेदभाव, छुआछूत, बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ जागरूकता फैलाता है। यहाँ धर्म, जाति या ऊँच-नीच का कोई भेदभाव नहीं है और सभी को समान रूप से देखा जाता है। आश्रम गरीब और मुसहर समुदाय के बच्चों, खासकर लड़कियों, की शिक्षा पर विशेष ध्यान देता है जहाँ 4–5 आश्रमों में 280 से अधिक लड़कियाँ पढ़ रही हैं। बंजरिया में लड़कियों के लिए पहला छात्रावास करीब 16-17 साल पहले खोला गया था। आश्रम पूरी तरह आत्मनिर्भर है और सरकारी सहायता के बजाय समाज के विभिन्न वर्गों के सहयोग से चलता है। साथ ही, केदारनाथ, कश्मीर, नेपाल भूकंप और कोसी बाढ़ जैसी आपदाओं में भी इसने सक्रिय राहत कार्य किए हैं। आश्रम का संचालन गांधीवादी सिद्धांतों स्वच्छता, सादगी और सामूहिक श्रम पर आधारित है।

सर्व सेवा संघ के मंत्री एवं यात्रा दल के सदस्य अरविंद अंजुम ने मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के संकट और गांधी की बुनियादी शिक्षा (नई तालीम ) की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन का वास्तविक अर्थ केवल संपत्ति, घर या जमीन इकट्ठा करने में नहीं है, बल्कि वह लाभ महत्वपूर्ण है जो जीवन को बेहतर और सार्थक बनाता है। विनोबा भावे के अनुसार, बचपन विशेषकर चार साल तक की उम्र सीखने की सबसे प्रबल अवस्था होती है, जब बच्चे गहरी एकाग्रता से चीज़ों को समझते हैं; लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में कई खामियाँ हैं, जहाँ छात्र अचानक जिम्मेदारियों के बोझ में आ जाते हैं और अक्सर बिना वास्तविक रुचि के केवल नौकरी के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए प्रायोगिक ज्ञान को प्राथमिकता देना आवश्यक है जैसे इंजीनियर बनने से पहले मैकेनिक और डॉक्टर बनने से पहले कंपाउंडर का अनुभव लेना ताकि शिक्षा व्यवहारिक और उपयोगी बन सके। भारत में शिक्षा की एक बड़ी समस्या यह भी रही है कि मेहनत और ज्ञान को अलग कर दिया गया है, जबकि दोनों का मेल ही शिक्षा को उत्पादक और सृजनशील बनाता है। महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा का सिद्धांत ‘करके सीखना’ इसी विचार को मजबूत करता है कि बिना काम किए वास्तविक सीख संभव नहीं है। गांधी और विनोबा ने एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की जो प्रेम, करुणा, बंधुत्व और समानता पर आधारित हो । सकारात्मक मानवीय संकल्प लेने से ही बदलाव संभव होता है, जैसा कि अरबी वाक्यांश ‘कुन फया कुन’ का संदेश है- जो हम सोचते हैं, वह हो जाता है। 
 
सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता शाहिद कमल ने कहा कि यदि हम भविष्य की शिक्षा की बात कर रहे हैं, तो क्रांतिकारी शिक्षा देने से पहले यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि शिक्षा को एक मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाए। यह अधिकार नागरिकों को कानून द्वारा मिला हुआ है, और जब जनता टैक्स देती है, तो यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह सभी को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराए। उन्होंने आगे कहा कि कार्यकर्ताओं, एनजीओ और सामाजिक संगठनों को सरकार पर निरंतर दबाव बनाना होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर नागरिक को बेहतर गुणवत्ता की शिक्षा प्राप्त हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया में भारत जैसी बहु-स्तरीय (multi-layered) शिक्षा व्यवस्था कहीं और नहीं है। अन्य देशों में शिक्षा प्रणाली अधिकतर एक समान होती है, जबकि भारत में अलग-अलग स्तरों की शिक्षा व्यवस्था मौजूद है, जो सामाजिक असमानता को बढ़ाती है। उन्होंने इस तरह की असमान शिक्षा प्रणाली को देश के लिए उचित नहीं बताते हुए इसे समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया।

पंजाब के रहने वाले रिटायर्ड एयरफोर्स कर्मी एवं पूरी यात्रा में शामिल सुनील कुमार शर्मा ने कहा कि चंपारण में नारी शक्ति और सामाजिक जागृति का प्रभाव गहराई से दिखाई देता है। महिलाओं और किशोरियों ने न केवल महात्मा गांधी के सपनों को आगे बढ़ाया है, बल्कि आश्रमों का सफल संचालन करते हुए आर्थिक आत्मनिर्भरता भी हासिल की है, जैसे चरखा सदन में उत्पादन कार्यों के माध्यम से। उन्होंने अपने अधिकारों के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक संघर्ष भी किया है- फूलकली देवी की व्यक्तिगत लड़ाई और कई महिलाओं का मिलकर जमींदारों का सामना करना इसके उदाहरण हैं। भूमि अधिकार एक प्रमुख समस्या बनी हुई है, जहां लोगों को वर्षों पुराने पट्टों के बावजूद जमीन का कब्जा नहीं मिला है। साथ ही, शिक्षा और स्वच्छता के क्षेत्र में भी सकारात्मक प्रयास हो रहे हैं, जहां बच्चे खुद पढ़कर दूसरों को शिक्षित कर रहे हैं। बिहार में शराबबंदी लागू कराने में भी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, हालांकि भविष्य में इसके हटने की आशंका को देखते हुए एकजुटता की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। वर्तमान चुनौती यह है कि समाज छोटे-छोटे समूहों में बंटा हुआ है, जबकि सामूहिक प्रयास से ही स्थायी परिवर्तन संभव है।

सभा में यात्रा दल के सदस्य कीर्ति, उमेश तूरी ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि यह यात्रा गांधी के विचारों और मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने का अभियान है। यात्रा के माध्यम से उन्होंने सिर्फ बिहार को ही नहीं , बल्कि देश को जाना है और उन्होंने कहा कि रास्ते में लोगों का सहयोग, प्रेम और उत्साह इस बात का प्रमाण है कि आज भी समाज में गांधीवादी विचारों की प्रासंगिकता बनी हुई है। 

शाम 4 बजे यात्री दल अंजुआ गांव स्थित विश्व मानव सेवा आश्रम के विनोबा खादी ग्रामोद्योग समिति केंद्र पहुंचा, जहां उन्होंने खादी उत्पादन की प्रक्रिया को देखा और महिला बुनकरों से संवाद किया। यहां शुद्ध खादी का निर्माण बिना किसी मिलावट के किया जाता है तथा बुनकरों को न्यूनतम मानकों के अनुरूप उचित वेतन भी दिया जाता है। इसके बाद दल ने गांव में नारे लगाते हुए पदयात्रा की, यात्रा के उद्देश्यों को समझाया और पर्चों का वितरण किया। शाम 6:30 बजे आश्रम में सर्वधर्म प्रार्थना के साथ दिन का समापन हुआ।

यात्रा दल में शामिल सदस्य :

यात्रा संयोजक अशोक भारत , सर्व सेवा संघ के  सचिव अरविंद अंजुम, उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज, सामाजिक कार्यकर्ता सिस्टर फ्लोरिन , हिमालय विजेता कीर्ति, वैज्ञानिक चेतना निर्माण कार्यकर्ता विकास कुमार, युवा कार्यकर्ता, उमेश तूरी, मयूर साखरे, पर्यावरण कार्यकर्ता अनूप कुमार, अशोक कुमार सिंह, विष्णु कुमार , पंजाब से सुनील कुमार शर्मा , सिराज अहमद , ब्रह्म विद्या मंदिर, विनोबा आश्रम, पवनार ज्योति बहन, गुजरात से जम्मू बहन,  बंगाल से जीतेन नंदी, कस्तूरबा ट्रस्ट से संबंधित चंद्रमा, महाराष्ट्र से प्राची बहन, बेतिया से भावेश। 

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