पर्चाधारी किसानों को कब्जा मिले – यात्री दल
प्रेस विज्ञप्ति – 17 अप्रैल 2026
बेतिया, पश्चिमी चंपारण
जहां पड़े पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ
पटना से चंपारण यात्रा
10 अप्रैल से 22 अप्रैल 2026
आजादी के आंदोलन की विरासत, सद्भावना, लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की रक्षा एवं उन्हें मजबूत करने के उद्देश्य से “जहां पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ” पटना से चंपारण यात्रा निकाली गई है।आठवें दिन की सुबह 6:30 बजे देवी लाल साह बंगला, मोतीझील से यात्रा आगे बढ़ी। छगराहा में अवकाश प्राप्त शिक्षक अवधेश झा ने यात्रियों का स्वागत करते हुए जलपान की व्यवस्था की।
यात्रा सुबह 8 बजे हरिवाटिका चौक, बेतिया पहुंची, जहां शहर के स्थानीय साथियों ने यात्रा दल के सभी सदस्यों का स्वागत किया। चौक पर स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा पर यात्रियों ने माल्यार्पण किया।
इसके बाद यात्रा संस्कृति इंटरनेशनल स्कूल पहुंची, जहां यात्रियों का स्वागत किया गया। इसके पश्चात बच्चों के साथ संवाद सत्र आयोजित हुआ। सत्र की शुरुआत में गुजरात के सूरत से यात्रा में शामिल जम्मू बहन ने गीत प्रस्तुत किया।
यात्रा के आयोजक अशोक भारत ने बच्चों से संवाद करते हुए बताया कि भारत वह देश है, जहां से चार प्रमुख धर्म- हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख का उद्भव हुआ। यहां दुनिया के सभी धर्मों के लोग रहते हैं। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था कि सभी धर्मों का सम्मान होना चाहिए, केवल अपने धर्म तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमारी परंपरा एकता और आपसी बंधुत्व की रही है, लेकिन कुछ लोग बिना शिक्षा और समझ के समाज को बांटने का काम करते हैं, जो गलत है। इसलिए शिक्षा बहुत जरूरी है, क्योंकि शिक्षा से चरित्र निर्माण होता है। महात्मा गांधी की ‘नई तालीम’ (बुनियादी शिक्षा) का उद्देश्य भी यही था कि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो।
संस्कृति इंटरनेशनल स्कूल कार्यक्रम के दौरान सुभलाल पंडित, अमानुल हक और आलमगीर उपस्थित रहे।
इसके बाद यात्रा दल ऐतिहासिक राजकीय बुनियादी विद्यालय, वृंदावन आश्रम पहुंचा। वर्ष 1939 में गांधी सेवा संघ के अधिवेशन के क्रम में महात्मा गांधी वृंदावन पहुंचे थे और यहां सात दिनों तक रहे थे। उसी दौरान उन्होंने यहां बुनियादी स्कूल की शुरुआत की थी। 1917 के चंपारण सत्याग्रह के दौरान शिक्षा के प्रसार के लिए गांधीजी ने चंपारण में कई विद्यालय शुरू किए थे, लेकिन गांधी की शिक्षा नीति—ज्ञान, कौशल और चरित्र के लक्ष्य से प्रेरित- बुनियादी विद्यालयों की वास्तविक शुरुआत 1939 में हुई। वृंदावन क्षेत्र में प्रजापति मिश्र के नेतृत्व में यहां 43 बुनियादी स्कूल खोले गए। प्रजापति मिश्र ने 103 बीघा (लगभग 145 एकड़) अपनी जमीन तथा अन्य लोगों से जमीन संग्रह करके इन विद्यालयों की स्थापना की। बाद में वे बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने। जब वे विधायक का चुनाव लड़े, तो उन्होंने प्रचार करने से इनकार कर दिया। जनता ने स्वयं उनके चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी उठाई। चुनाव जीतने के बाद वे एक महीने तक बैलगाड़ी से गांव-गांव घूमकर लोगों का आभार व्यक्त किया।
यहां पहुंचकर यात्रा दल दो समूहों में विभक्त हो गया और अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों के साथ संवाद सत्र आयोजित किए गए। उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष एवं यात्रा दल के सदस्य रामधीरज ने कहा कि आज भी दुनिया भर में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। पहले लड़कियों के लिए स्कूल जाना भी मुश्किल था, लेकिन आज वे लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर समाज में आगे बढ़ रही हैं। यह कुछ लोगों के त्याग और संघर्ष का परिणाम है। नौकरी के साथ-साथ देश सेवा और समाज सेवा करना भी बहुत जरूरी है। किसी को पढ़ाना भी देश सेवा है और सफाई कर्मी का काम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यात्रा दल की सदस्य कीर्ति वर्मा, जिन्होंने वर्ष 2019 में माउंट एवरेस्ट फतह किया था, ने अपनी प्रेरणादायी यात्रा साझा की और बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में अगर जुनून हो, तो अवसर खुद बनते हैं। कठिनाइयां आएंगी, लेकिन उनसे लड़कर ही सफलता मिलती है।
स्कूल के अध्यापक ने एक विजिटर डायरी दिखाई, जिसमें महात्मा गांधी के हस्ताक्षर तथा राजेंद्र प्रसाद का हस्ताक्षर एवं शुभकामना संदेश अंकित है। स्कूल के शिक्षक अवधेश शुक्ल एवं विद्यालय प्रभारी आशुतोष कुमार भी उपस्थित रहे।
सामाजिक कार्यकर्ता पंकज ने सरकारी अनदेखी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पहले बिहार में करीब 500 बुनियादी विद्यालय थे, लेकिन आज केवल करीब 300 बुनियादी विद्यालय ही चल रहे हैं, वो भी सामान्य विद्यालय की तरह। चंपारण में पहले 43 बुनियादी विद्यालय थे, जो अब घटकर मात्र 35 रह गए हैं और इनमें भी सामान्य पाठ्यक्रम ही चलाया जा रहा है।
इसके बाद यात्रा दल वृंदावन में स्थित सत्याग्रह स्मारक पहुंचा, जहां गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया।
22 एवं 23 अक्टूबर 1937 को वर्धा में हुए अखिल भारतीय शिक्षा सम्मेलन में राष्ट्र निर्माण के लिए शिक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हुए ‘नई तालीम’ या बुनियादी शिक्षा की अवधारणा पर विचार किया गया। इसके बाद गांधी सेवा संघ का पांचवां अधिवेशन 3 से 8 मई 1939 को वृंदावन में आयोजित हुआ। इसमें महात्मा गांधी के अतिरिक्त कस्तूरबा गांधी, महादेव देसाई, प्यारेलाल, सुशीला नायर आदि ने भाग लिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने तिरंगा फहराकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। गांधीजी ने अहिंसा एवं सत्याग्रह को परिभाषित किया। बेतिया के प्रजापति मिश्र ने कहा कि पांच मील की परिधि में आने वाले सभी गांवों में चरखा की व्यवस्था की जाएगी। गांधीजी ने कहा कि चरखा, अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से बिहार की स्थिति में परिवर्तन लाया जा सकता है। 4 मई को गांधीजी को बीस हजार रुपये की थैली समर्पित की गई। गांधीजी ने कहा कि चंपारण से गहरा लगाव होने के कारण ही वे बार-बार यहां आते हैं। 5 मई को कुमारबाग में बुनियादी विद्यालय के शिक्षकों को संबोधित करते हुए गांधीजी ने कहा कि शिक्षा का संबंध मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और भावनाओं से है। उन्होंने कहा कि बच्चों को जिस कौशल की जानकारी देनी हो, शिक्षकों को स्वयं उसमें निपुण होना चाहिए। इस अधिवेशन में खान अब्दुल गफ्फार खान, पंडित जवाहर लाल नेहरू एवं डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी संबोधन दिया। वृंदावन अधिवेशन के बाद प्रजापति मिश्र द्वारा चंपारण के विभिन्न गांवों में बुनियादी विद्यालयों की स्थापना की गई।
शाम में यात्रा दल पांच अलग-अलग गांवों- टोला उपाध्याय टोला, गुरसेन टोला, परसौना टोला, गिनुअलिया और पूर्वी तुरहा पट्टी में पहुंचा , यहां पर सभाएं आयोजित कीं गई थी । ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं तथा उनके संभावित समाधान भी साझा किए।
ग्रामीणों के माध्यम से यात्री दल को जानकारी मिली कि पिछले 40-50 वर्षों में लगभग 2 लाख 23 हजार लोगों को जमीन आवंटन के परचे दिए गए। सीलिंग के तहत फालतू जमीन का आवंटन भी किया गया, लेकिन अब तक केवल करीब 25,000 परिवारों को ही वास्तविक रूप से उन जमीनों पर कब्जा मिल पाया है। शेष भूमिहीन किसान आज भी अपने हक के लिए नौकरशाही और न्यायालयों के चक्कर काट रहे हैं। कई बार आंदोलन और धरने भी हुए, लेकिन जिला प्रशासन (डीएम) के आदेशों के बावजूद जमीन का सीमांकन और कब्जा दिलाने का काम अभी भी अधूरा पड़ा है। इसी कारण अब लोग एक बार फिर बड़े स्तर पर आंदोलन की योजना बना रहे हैं। वे चंपारण के नील सत्याग्रह से प्रेरणा लेकर “भूमि सत्याग्रह” शुरू करने पर विचार कर रहे हैं, ताकि वर्षों से लंबित अपने अधिकार प्राप्त किए जा सकें।
उपाध्याय टोला में मदन राम, परसौना टोला में संजय, गिनुअलिया टोला में संत राम एवं राजकुमार राम, तथा पूर्वी तुरहा पट्टी में संत राम उपस्थित रहे। पंकज जी, लालाबाबू राम और संत राम ने पांचों सभाओं के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर सभी प्रमुख स्थानीय आयोजकों को सर्वोदय जगत पत्रिका का यात्रा विशेषांक, ‘गांधी दर्शन के तात्विक आधार’ पुस्तक, सर्वोदय डायरी तथा कस्तूरबा कैलेंडर स्मृति स्वरूप भेंट किया गया।
यात्रा दल में शामिल प्रमुख सदस्य:
यात्रा संयोजक: अशोक भारत, सर्व सेवा संघ के सचिव अरविंद अंजुम ,उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष: रामधीरज , सिस्टर फ्लोरिन, हिमालय विजेता कीर्ति, विकास कुमार, उमेश तूरी, मयूर साखरे, अनूप कुमार, अशोक कुमार सिंह, विष्णु कुमार, एस. श्रीनिवासन (तमिलनाडु), सुनील कुमार शर्मा (पंजाब), सिराज अहमद, ज्योति बहन (ब्रह्म विद्या मंदिर, विनोबा आश्रम, पवनार), जम्मू बहन (गुजरात), चंद्रमा (कस्तूरबा ट्रस्ट), प्राची बहन (महाराष्ट्र) आदि।
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