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सातवें दिन यात्रा मोतिहारी के कई ऐतिहासिक स्थानों पर पहुंची – जहां गांधी के कदम पड़े थे

“सेवा, साधना और शोध की समग्र प्रक्रिया द्वारा समाज में रचनात्मक बदलाव संभव हैं” – ज्योति बहन

प्रेस विज्ञप्ति – 16 अप्रैल 2026
मोतिहारी, पूर्वी चंपारण

जहां पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ
पटना से चंपारण यात्रा
10 अप्रैल से 22 अप्रैल 2026

आजादी के आंदोलन की विरासत, सद्भावना, लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों की रक्षा तथा उन्हें मजबूत करने के उद्देश्य से “जहां पड़े कदम गांधी के – एक कदम गांधी के साथ” पटना से चंपारण यात्रा निकाली गई है। यात्रा के सातवें दिन आज सुबह 7 बजे देवी लाल साह बंगला, मोतीझील में स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार समिति द्वारा यात्री दल के सभी सदस्यों का स्वागत किया गया।

इसके बाद प्रभातफेरी निकाली गई। यात्रा दल को स्थानीय आयोजकों के साथियों द्वारा मोतिहारी के उन महत्वपूर्ण पड़ावों पर ले जाया गया, जहां महात्मा गांधी के कदम पड़े थे। सबसे पहले यात्रा मुख्य सड़क (Main Road) के पास स्थित साहू मंदिर पहुंची। यहां कस्तूरबा गांधी और महात्मा गांधी ने महिलाओं के साथ एक सभा की थी, जिसमें आसपास की महिलाओं को स्वदेशी, स्वच्छता और स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग करने का संदेश दिया गया था। उस समय आंदोलन के दौरान ऐसे छोटे-छोटे मंदिर, चौक या धर्मशालाएं ही सभा स्थल बनते थे। इसके बाद यात्री दल मंदिर के ठीक बगल में स्थित जामा मस्जिद उर्फ बड़ी मस्जिद पहुंचा। यह भारत के सामंजस्य और सहअस्तित्व का जीवंत प्रतीक है।

वर्ष 1917 में जब महात्मा गांधी बिहार के चंपारण क्षेत्र आए थे, उस समय स्थानीय लोगों ने उन्हें भरपूर सहयोग दिया था। बाबू रामदयाल प्रसाद साह उन्हीं प्रमुख लोगों में से एक थे, जिन्होंने गांधीजी को अपने घर में ठहराया और आंदोलन में सक्रिय सहयोग दिया। यात्री दल उस स्थान पर भी गया, जहां कभी उनका घर हुआ करता था। इसके बाद यात्रा गौरी शंकर साह विद्यालय पहुंची। यह वही जगह है जहां महात्मा गांधी को ठहरने के लिए बाबू रामदयाल प्रसाद साह ने एक स्वतंत्र मकान दिया था, जो उस समय पटाजानी विद्यालय था। बाद में इसे एक बुनियादी विद्यालय के रूप में विकसित किया गया।

यात्रीगण सुबह 8:30 बजे महात्मा गांधी सत्याग्रह स्मारक पहुंचे और सर्वधर्म प्रार्थना की। यह वही स्थान है जहां 18 अप्रैल 1917 को गांधीजी को अदालत में पेश किया गया था। 15–16 अप्रैल 1917 को गांधीजी मोतिहारी पहुंचे थे। तत्कालीन प्रशासन ने उन्हें जिला छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन गांधीजी ने इसे मानने से इनकार कर दिया। यहां लगभग 48 फीट ऊंचा पत्थर का स्तंभ है, जिसे प्रसिद्ध कलाकार नंदलाल बोस ने डिजाइन किया था। ज्ञात हो कि संविधान की मूल प्रति पर भी नंदलाल बोस ने चित्र अंकित किए हैं। यात्री दल ने परिसर में स्थित म्यूजियम का भी भ्रमण किया। म्यूजियम में चंपारण आंदोलन से जुड़े फोटो, दस्तावेज और गांधीजी के उपयोग की वस्तुएं भी मौजूद हैं। वहां एक विशाल टेबल भी है, जिस पर नीलहे किसानों की समस्याओं का दस्तावेज तैयार किया जाता था।

इसके बाद यात्रा अगले पड़ाव बंजरिया पंडाल गांधी आश्रम पहुंची। बाबू देवी लाल साह ने महात्मा गांधी को ढाई बीघा जमीन तथा एक बड़ा मकान स्थायी आश्रम और कार्यालय बनाने के लिए दान दिया था। 24 मई 1918 को महात्मा गांधी ने स्वयं इस आश्रम का शिलान्यास किया था। आज इस आश्रम में गांधीजी की प्रतिमा और शहीद स्मारक भी मौजूद है, जिसमें चंपारण आंदोलन के क्रांतिवीरों के नाम अंकित हैं।

दोपहर 1 बजे देवी लाल साह बंगला में विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसका विषय था – “आजादी की विरासत, लोकतंत्र एवं संविधान”। गोष्ठी का आयोजन सर्व सेवा संघ, प्रदेश सर्वोदय मंडल बिहार तथा स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी परिवार समिति, मोतिहारी, पूर्वी चंपारण द्वारा किया गया था। गोष्ठी में बिहार के कई जिलों से लोग उपस्थित थे।

महाराष्ट्र के ब्रह्म विद्या मंदिर, पवनार से यात्रा में शामिल ज्योति बहन ने अपने संबोधन में कहा कि महात्मा गांधी ने चंपारण सत्याग्रह के माध्यम से केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि सेवा, सत्य और स्वावलंबन का मार्ग भी दिखाया। उन्होंने गांधीजी के जीवन के तीन प्रमुख आयामों- सेवक, साधक और शोधक का उल्लेख करते हुए कहा कि बापू ने सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन से इन आदर्शों को साकार किया। उन्होंने बताया कि सच्ची सेवा वही है जो मानवता के समग्र विकास और दूसरों के दुख-दर्द को समझने से जुड़ी हो।उन्होंने कहा कि गांधीजी और विनोबा भावे ने बिहार की धरती से किसानों और गरीबों के लिए संघर्ष कर समाज में नई चेतना जगाई। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम केवल भाषण न दें, बल्कि गांवों में जाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के कार्यों के माध्यम से बापू के आदर्शों को अपने जीवन में उतारें।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए सीताराम प्रसाद ने कहा कि छोटे-छोटे प्रयासों से ही समाज को बदला जा सकता है। इंसान के जिम्मे जो काम होता है, जब वह उस काम की जरूरत और नियम के अनुसार अपनी भूमिका नहीं निभा पाता और केवल बोलने लगता है, तो उसका प्रभाव नहीं पड़ता। उन्होंने कहा कि देवी लाल परिसर में गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के संबंध में जो संग्रह और प्रदर्शनी तैयार की गई है, वह अद्भुत है। इस कार्य को जिस मनोयोग से डॉ. चंदन कुमार और संजीव ने पूरा किया है, वह सराहनीय है।

विचार गोष्ठी की अध्यक्षता सीताराम प्रसाद ने की, संचालन संजीव ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार वर्मा ने दिया। कार्यक्रम में शशिकला, शत्रुघ्न झा, चंचल कुमार, अजहर हुसैन, विजयकांत त्रिपाठी आदि भी मौजूद रहे।

शाम में चंद्रहिया गांधी स्मारक में यात्री दल ने सर्वधर्म प्रार्थना की। आज ही के दिन, 16 अप्रैल 1917 को महात्मा गांधी मोतिहारी से इसी गांव के रास्ते जसौली पट्टी गांव जा रहे थे। यात्रा का उद्देश्य वहां के किसानों और मजदूरों पर अंग्रेज नीलहों द्वारा किए जा रहे जुल्म की घटनाओं की जांच करना था। इस गांव में पहुंचते ही एक दारोगा ने उन्हें एक पत्र दिया, जिसके द्वारा गांधीजी को तत्काल चंपारण जिला छोड़कर चले जाने का आदेश दिया गया था। पत्र प्राप्त होते ही महात्मा गांधी ने अपने साथियों को जसौली पट्टी भेज दिया और स्वयं यहीं से बैलगाड़ी द्वारा मोतिहारी वापस लौट गए। इस प्रकार चंपारण आंदोलन का बीजारोपण इसी गांव में हुआ था।

आज यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर सभी प्रमुख स्थानीय आयोजकों को सर्वोदय जगत पत्रिका का यात्रा विशेषांक, ‘गांधी दर्शन के तात्विक आधार’ पुस्तक, सर्वोदय डायरी और कस्तूरबा कैलेंडर स्मृति-स्वरूप भेंट किए गए।

यात्रा दल में शामिल साथी:

सर्व सेवा संघ के सचिव अरविंद अंजुम, उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष राम धीरज, सामाजिक कार्यकर्ता सिस्टर फ्लोरिन, यात्रा संयोजक अशोक भारत, आरा से अशोक सिंह, तमिलनाडु से श्रीनिवासन, हिमालय विजेता कीर्ति, वैज्ञानिक चेतना निर्माण कार्यकर्ता विकास कुमार, युवा सामाजिक कार्यकर्ता उमेश तूरी, महाराष्ट्र से मयूर साकरे, पंजाब से सुनील कुमार शर्मा तथा पर्यावरण कार्यकर्ता अनूप कुमार।

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