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बच्चे गांधीजी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं – पदयात्रा का 8वां दिन

गांधीजी की बुनियादी शिक्षा के आदर्शों पर चल रहे शिक्षा-निकेतन पहुंचा पदयात्रा दल

“बच्चे गांधीजी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं” – सत्यनारायण घोष

“आदिवासी समाज की नई पीढ़ी के भविष्य के लिए शिक्षा बेहद जरूरी” – आसमा आदिवासी

कलानबग्राम, 9 अक्टूबर। गांधी जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर से शुरू हुई ‘जहाँ पड़े कदम गांधी के, एक कदम गांधी के साथ’ पदयात्रा अपने आठवें दिन मेमारी से आगे बढ़ते हुए रसूलपुर को पार कर पूर्व वर्धमान जिले के कलानबग्राम स्थित शिक्षा-निकेतन पहुंची। सर्व सेवा संघ एवं अन्य लोकतांत्रिक संगठनों द्वारा आयोजित यह पदयात्रा प्रेम, शांति, अहिंसा और सामाजिक सद्भाव का संदेश लेकर आगे बढ़ रही है। 16 अक्टूबर को यात्रा शांतिनिकेतन पहुंचेगी।

देश के विभिन्न हिस्सों से आए लगभग 15 राज्यों के पदयात्री इस यात्रा में शामिल हैं। आठवें दिन की शुरुआत सर्वधर्म प्रार्थना से हुई। सुबह 7 बजे प्रस्थान से पहले स्थानीय आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया गया और उन्हें भेंटस्वरूप सर्वोदय डायरी 2027 तथा महात्मा गांधी की आत्मकथा प्रदान की गई। इसके बाद नारों और गीतों के साथ यात्रा आगे बढ़ी।

रास्ते में मिला लोगों का समर्थन, जीवंत दिखी गांधी-टैगोर की विरासत

पदयात्रा के दौरान लोगों से संवाद, नुक्कड़ सभाओं और गीतों के माध्यम से शांति, अहिंसा और सामाजिक सद्भाव का संदेश साझा किया गया। रास्ते में वयस्कों, युवाओं, मजदूरों, किसानों और छोटे व्यापारियों सहित समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने यात्रा के प्रति समर्थन जताया।

लोगों की यह सहभागिता दर्शाती है कि गांधीजी और रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचार आज भी बंगाल के जनमानस में जीवंत हैं।

रसूलपुर में विश्राम, शाम को शिक्षा-निकेतन पहुंचा यात्रा दल

दोपहर में पदयात्रा रसूलपुर पहुंची, जहां यात्रियों के लिए भोजन और विश्राम की व्यवस्था की गई। इसके बाद यात्रा अपने दिन के अंतिम पड़ाव शिक्षा-निकेतन, कलानाबगरम पहुंची। यहां संस्थान के प्रशासनिक सदस्यों ने पदयात्रियों का स्वागत किया।

शाम 7 बजे संस्थान परिसर में एक सभा आयोजित की गई, जिसमें विद्यालय और छात्रावास के बच्चे, शिक्षा-निकेतन के प्रशासनिक सदस्य तथा पदयात्रा दल के साथी शामिल हुए। सभा में गांधीजी के शैक्षिक दर्शन, सामाजिक समरसता, जनजातीय बच्चों की शिक्षा और मानवीय मूल्यों पर विचार साझा किए गए।

गांधीजी की बुनियादी तालीम से जुड़ा है शिक्षा-निकेतन का इतिहास

शिक्षा-निकेतन की सचिव रीना हाटी ने संस्थान के इतिहास और शैक्षिक उद्देश्यों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान की शुरुआत वर्ष 1935 में ‘विद्यालय’ के रूप में महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा यानी ‘बुनियादी तालीम’ के दर्शन से प्रेरित होकर हुई थी। इसके संस्थापकों में विजय कुमार भट्टाचार्य, ज्योतिषचंद्र राय और उपेंद्रनाथ दास शामिल थे।

वर्ष 1951 में साधना भट्टाचार्य और रेणुका गुहा के सहयोग से संस्थान का पुनरुद्धार किया गया। वर्ष 1953 में इसे औपचारिक रूप से ‘शिक्षा-निकेतन’ नाम से पंजीकृत किया गया।

उन्होंने बताया कि यहां स्थित आचार्य प्रमथनाथ बुनियादी विद्यालय में किताबी शिक्षा के साथ व्यावहारिक कौशल, हस्तशिल्प, कृषि, व्यावसायिक प्रशिक्षण, सांस्कृतिक गतिविधियों और छात्र स्वशासन पर विशेष जोर दिया जाता है। संस्थान का उद्देश्य विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाना और उनके सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करना है।

शिक्षा-निकेतन की गतिविधियां केवल विद्यालयी शिक्षा तक सीमित नहीं हैं। पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, पुस्तकालय, संग्रहालय, ग्रामीण विकास और शिक्षक प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में भी संस्थान योगदान देता है।

शाम में पदयात्री दल द्वारा बच्चो के साथ संवाद

रात 7 बजे एक सभा का आयोजन किया गया जिसमें स्कूल, हॉस्टल में रहे बच्चे, शिक्षानीकेतन केअधिकारियों, शिक्षकों एवं पदयात्री दल के साथी शामिल थे ।

सभा में शिक्षा-निकेतन के अध्यक्ष सत्यनारायण घोष ने पदयात्रियों का स्वागत करते हुए कहा कि विद्यालय के संस्थापक विजय कुमार भट्टाचार्यने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अहिंसा का मार्ग अपनाया और कई बार जेल गए।

उन्होंने भारतीय विचारों और आदर्शों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था के निर्माण तथा विद्यार्थियों को तैयार करने में उनके योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि विजय कुमार भट्टाचार्य ने राजनीतिक नेतृत्व स्वीकार करने के बजाय शिक्षा और समाज निर्माण को प्राथमिकता दी।

उन्होंने आगे कहा कि पदयात्रियों का शिक्षा-निकेतन की धरती पर पहुंचना संस्थान के लिए सम्मान की बात है। उन्होंने विद्यार्थियों से पदयात्रियों से मिली सीख को याद रखने और गांधीजी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने की अपील की।

मध्य प्रदेश के रीवा की सामाजिक कार्यकर्ता आसमा आदिवासी ने आदिवासी समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना उनके बेहतर भविष्य की नींव रखने जैसा है।

स्वयं आदिवासी समुदाय से आने और अपने परिवार में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली पहली पीढ़ी का हिस्सा होने के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि संस्थान में पढ़ रहे संथाल और उरांव समुदाय बच्चों को देखकर उन्हें प्रेरणा मिली है।

छात्रों से मन लगाकर पढ़ाई करने और शिक्षकों का सम्मान करने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि आदीवासी समाज की नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षा बेहद जरूरी है।

गांधीजी के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बच्चों से सत्य, अहिंसा, शांति, अनुशासन और आपसी प्रेम के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।

सभा में बंगाल से आए पदयात्री बिप्लब नायक और विद्याधर मास्टर ने भी बच्चों के साथ पदयात्रा के उद्देश्य और गांधीजी के विचारों पर चर्चा की। उन्होंने प्रेम, अहिंसा, सामाजिक सद्भाव और संविधान के मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

सभा का संचालन सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष चंदन पाल ने किया, जबकि सर्व सेवा संघ के मंत्री अरविंद अंजुम ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

सभा के दौरान मध्य प्रदेश के शहडोल से आए इस्तियाक भाई और राजस्थान से आए जगदीश कुमार ने सांस्कृतिक गीत प्रस्तुत किए। अंत में शिक्षा-निकेतन का सामूहिक गीत गाया गया। सुंदरबन, बंगाल से प्रदीप सरदार एवं चितरंजन प्रमाणिक द्वारा जनगीत प्रस्तुति किया गया ।

पदयात्रा में शामिल साथी – आठवें दिन की पदयात्रा में निधि, अलीभा, अनोखेलाल, विद्याधर मास्टर, चितरंजन प्रमाणिक, सदानंद मंडल, पारमिता, प्रदीप सरदार, देबाशीष, बिस्वजीत गोराई, विष्णु, अनूप कुमार, आसमा आदिवासी, किरण, सिद्धार्थ, चंदन पाल, बिरेन डेका, सतीश मराठा, जितेन नंदी, सोहन चक्रवर्ती, सुसोवन पाल, श्रीनिवासन, विक्रम पाटिल, बिप्लब नायक, अरविंद अंजुम, इस्तियाक, सुशांत मोहंती, किरण वीर, सतरंजन पाल, शिव शंकर दास, आदित्य, सौमित आचार्य, शांतू सरदार, जगदीश कुमार और विकास कुमार सहित अन्य पदयात्री शामिल रहे।

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